फिर आया बसंत,,,,,,
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| Rajesh kondal |
आसमान में एसे उड़ी पतंगे,,
कट कर आजाद होने की हो फिराक़ में
पैरो में लगे है इनके धागों के ज़नदे,,,,
जिस ओर की है हवा उस ओर के है ये
जिस ओर का शौर है उस ओर के है ये
एक दूसरे में कुछ एसे उलझ जाएं
हो आफ़त के जैसे ये करिन्दे,,,,,,
राजेश कौंडल




