Monday, February 3, 2014

फिर आया बसंत,,,,,,


Rajesh kondal

रंग विरंगे हो जैसे आज परिंदे
आसमान में एसे उड़ी पतंगे,,
कट कर आजाद होने की हो फिराक़ में
पैरो में लगे है इनके धागों के ज़नदे,,,,
जिस ओर की है हवा उस ओर के है ये
जिस ओर का शौर है उस ओर के है ये 
एक दूसरे में कुछ एसे उलझ जाएं
हो आफ़त के जैसे ये करिन्‍दे,,,,,, 
                           राजेश कौंडल

Friday, January 31, 2014



यूं तो अकेला हूँ
पर अकेला नहीं हूँ मैं
मेरे साथ है विश्वाश तुम्हारा
और दिल में है ज़ज्बा 
कुछ कर दिखाने का
सोए राष्ट्र को जगाने का
इसलिए उठ खड़ा हो गया हूँ मैं
बिना किसी सहारे के
तेरे लिए ए मेरे देश
शिर्फ् तेरे लिए.............राजेश कौंडल

Friday, January 17, 2014


   
                                   सिकुड़ता शहर
क्यूँ चले आते है लोग
मेरे शहर में अपने गांव छोड़ कर 
रोजी रोटी या रोज़गार की तलाश में
आखिर कब तक प्नाहा देगा ये शहर
यहाँ आने वाले हर शक्श को........
नजाने क्यूं भूल जाते है लोग
की वो जिन साधनो की तलाश में
यहाँ आते है वो साधन 
इस शहर के पास असीमित तो नहीं है...
देखो जरा गोर से
कितन सिकुड़ गया है मेरा शहर 
तुम्हारी हर ख्वाइश पूरी करते करते......
                                   राजेश कौंडल

Thursday, January 9, 2014

Rajesh Kondal

प्यार ने कब सर उठाया है गरूर से
ये तो हर चेहरे पर शर्मिन्दा रहता है
आँखो से जुबान तक पहुंचता है देर से
मगर दिल मे ताउम्र जिंदा रहता है
मिट जाते है जिस्म मगर रूहे नहीं
टूट जाते है होंसले मगर आर्ज़ूए नहीं
क्योकिं सूखे हुए पेड़ की टार में भी
कोई न कोई परिंदा रहता है        
                              "राजेश कौंडल"

Tuesday, December 31, 2013


आंखो से दिल तक 
दिल से जान तक
बन आए तुम सनम
प्यार में...........
एक पल भी तेरे बिन अब कटता नहीं 
तेरे चेहरे के सिवा और कोई ज्चता नहीं
तेरी एक हंसी, मेरी हर खुशी बन गई
प्यार में...........
तुझसे है कैसा रिश्ता मेरा मैं जानु ना
दिल मे बड़ते हुए ज़ज्बात को पहचानू ना
तेरी हर सांस मेरी हर धड़कन बन गई
प्यार में........... 
                राजेश कौंडल